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Friday, 11 July 2014

ख्वाब,



कुछ पल के थम गईं आँखें जो उन्हें देखा
था शब का कोइ जुगनू या मेहताब कोइ था

जब ले के गई दीदे तमन्ना मुझे आगे
था इश्क़ कोइ रूठा या माशूक़ कोइ था

लिपटी हुइ मालाओं सी गालों पे सनम के
थी ज़ुल्फे परीशाँ या कोइ और बला थी

मैं डूब गया जिन में खुदा जाने वो कया थीं
थी झील कोइ नीली या आँखों कि खला थी

शब गुज़री की मैं भूल गया रात का मंज़र
था याद का मल्बा या कोइ ख्वाब वहाँ था


शब = रात
मेहताब = चांद
माशूक = प्रेमी
दीदे तमन्ना = देखने की लालसा


नदीम जहीर खान

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