Pages

Friday, 11 July 2014

अम्मा की बोली,


अम्मा की बोली मुझे कितना सताती है,
अम्मा की लोरी मुझे कितना रुलाती है।


काली अंधेरिया मे बेचैन हो दिल,
अम्मा की थपकी करे दूर मुश्किल।


नहीं चाहिये मुझको यह दिन खुदाया,
अम्मा के आँचल का लौटा दे साया।


लड़कपन के कन्चों की वो खनखनाहट,
बिखरती हवाओं की वो सनसनाहट।


प्यारी सी बहना की भोली सी बातें,
लड़ते उसी से उसी को हँसाते।


ज़माने में पहचान पाने की ज़िद में,
बहुत दूर आया कमाने की सिध में।


"कहा था ना तूने" बहुत याद आई'
बहुत ही सतायी बहुत ही रुलायी।


प्रीतम को अपने रुलाओ ना अब तुम,
चली आओ अम्मा सताओ ना अब तुम।




नदीम ज़हीर खान















No comments:

Post a Comment