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Wednesday, 4 June 2014

रक्तनीर

जब हृदय बोझिल होता है,
तब क्षुब्ध आत्मा होती है।
आँखों में तब अश्रु नहीं,
वो रक्तनीर होता है।

जब हृदय को ठेस लगे,
जब दुःख की धारा प्रवाहित हो,
जब आँखों से जल संचालित हो,
वो रक्तनीर होता है।

रात्रि स्वप्न में कोई आकर,
क्षण भर खुश कर जाता है।
भींगें जल से निंद्रा टूटे,
वो रक्तनीर होता है।

जब घुट-घुटकर कोई जीता है,
दुःख की चादर को सीता है।
सावन सा गाल भिंगोता है,
वो रक्तनीर होता है।

जब अपना कोई खोता है,
जब जीवन दुःखमय होता है,
जब हृदय हरदम रोता है,
वो रक्तनीर होता है।

नदीम ज़हीर खान

समर्पित


तन समर्पित मन समर्पित,
और ये यौवन समर्पित।
है पवित्रता को तेरे,
ये मेरा जीवन समर्पित।।

धमनी में प्रवाह जो है,
रक्त का कण-कण समर्पित।
सर तेरा झुकने से प्रथम,
श्वास का अंकन समर्पित।।

वीरों की धरती के पथ पर,
है मेरा पग-पग समर्पित।
अंग तो सब तुच्छ हैं,
ये आत्मा रग-रग समर्पित।।

गोद में तेरी पला मैं,
करता शत् यौवन समर्पित।
हृदय में माँ गंगा-सी तुम हो,
भगीरथ प्रतिपल समर्पित।।

मातृभूमि के मुख पे एक मुस्कान लाने के लिए,
मैं समर्पित मैं समर्पित मैं समर्पित।
स्वर्ग जैसे इस धरा मैं समाने के लिए,
मैं समर्पित मैं समर्पित मैं समर्पित।।

: नदीम ज़हीर ख़ान