जब हृदय बोझिल होता है,
तब क्षुब्ध आत्मा होती है।
आँखों में तब अश्रु नहीं,
वो रक्तनीर होता है।
जब हृदय को ठेस लगे,
जब दुःख की धारा प्रवाहित हो,
जब आँखों से जल संचालित हो,
वो रक्तनीर होता है।
रात्रि स्वप्न में कोई आकर,
क्षण भर खुश कर जाता है।
भींगें जल से निंद्रा टूटे,
वो रक्तनीर होता है।
जब घुट-घुटकर कोई जीता है,
दुःख की चादर को सीता है।
सावन सा गाल भिंगोता है,
वो रक्तनीर होता है।
जब अपना कोई खोता है,
जब जीवन दुःखमय होता है,
जब हृदय हरदम रोता है,
वो रक्तनीर होता है।
नदीम ज़हीर खान