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Friday, 11 July 2014

अम्मा की बोली,


अम्मा की बोली मुझे कितना सताती है,
अम्मा की लोरी मुझे कितना रुलाती है।


काली अंधेरिया मे बेचैन हो दिल,
अम्मा की थपकी करे दूर मुश्किल।


नहीं चाहिये मुझको यह दिन खुदाया,
अम्मा के आँचल का लौटा दे साया।


लड़कपन के कन्चों की वो खनखनाहट,
बिखरती हवाओं की वो सनसनाहट।


प्यारी सी बहना की भोली सी बातें,
लड़ते उसी से उसी को हँसाते।


ज़माने में पहचान पाने की ज़िद में,
बहुत दूर आया कमाने की सिध में।


"कहा था ना तूने" बहुत याद आई'
बहुत ही सतायी बहुत ही रुलायी।


प्रीतम को अपने रुलाओ ना अब तुम,
चली आओ अम्मा सताओ ना अब तुम।




नदीम ज़हीर खान















ख्वाब,



कुछ पल के थम गईं आँखें जो उन्हें देखा
था शब का कोइ जुगनू या मेहताब कोइ था

जब ले के गई दीदे तमन्ना मुझे आगे
था इश्क़ कोइ रूठा या माशूक़ कोइ था

लिपटी हुइ मालाओं सी गालों पे सनम के
थी ज़ुल्फे परीशाँ या कोइ और बला थी

मैं डूब गया जिन में खुदा जाने वो कया थीं
थी झील कोइ नीली या आँखों कि खला थी

शब गुज़री की मैं भूल गया रात का मंज़र
था याद का मल्बा या कोइ ख्वाब वहाँ था


शब = रात
मेहताब = चांद
माशूक = प्रेमी
दीदे तमन्ना = देखने की लालसा


नदीम जहीर खान

आवारगी



किस तरह झुठलाओगे मेरा मिजाज-ए-आशिकी,
मुश्क छुप सकता है पर छुपती नहीं आवारगी।

मेरे ग़मखाने से लेकर तेरे बुतखाने तलक,
ज़र्रे-ज़र्रे में सनम बिखरी हुई आवारगी।

तु इबादतगाह तक जा मैं चला मयखाने तक,
देखते हैं रंग किसकी लाती है आवारगी।

हसरतें जब नामुकम्मल हो के रह जाऐं नदीम,
इक क़दम आगे बढ़ाकर थाम लो आवारगी।

नदीम जहीर खान

आग की भीख को समर्पित



धुँधली हुई दिशायें छाने लगा कुहासा,
हर ओर छा रहा है घनघोर यह धुआँ सा,

क्या आज हो रहा है कोई मुझे बता दे,
सोये हुए यौवन को कोई तो अब जगा दे,

दुखती हुई रगों में संचार माँगता हूँ,
उन्माद मांगता हूँ अंगार माँगता हूँ,

प्यारे स्वदेश हित का उद्धार माँगता हूँ,
चढ़ती जवानियों का श्रॄंगार माँगता हूँ।

पश्चिम से उठ रहा है निर्भीक सा अँधेरा,
पूरब की अरुणिमा को जाकर किसी ने घेरा,

मानवता के तिमिर में गंगा खटक रही है,
बेहाल और बेबस ममता तड़प रही है,

ललकार शत्रु की रुक-रुक के आ रही है,
पहचान को यह मेरे धूमिल बना रही है,

यौवन अनलविशिख की पहचान माँगता हूँ,
सोयी वसुन्धरा से तूफान माँगता हूँ ।

दाता मुझे दे शक्ति अह्वान कर दूँ इसका,
आकाश पर अनल से लिख दूँ मैं नाम इसका,

रुकती रगों को मेरे धारा अनलमयी दे,
हर दूँ प्राण एक जो तू प्राण मुझको कई दे,

पिघले हुए अनल का अमृत कहीं से ला दे,
दुखती रगों को मेरे फिर घोल यह पिला दे,

दौड़े स्वदेश हित जो चिंगार माँगता हूँ,
ऐसी जवानियों का अभिसार माँगता हूँ।

विनती मेरी है दाता सिंह्नाद सा स्वर दे,
सुल्तान का खड़ग दे सम्राट का ज्वर दे,

ठहरी हुई है कश्ती आवेग में बढ़ा दे,
प्रचंड धूर्त लहरों से फिर उसे लड़ा दे,

मुर्झाये पुष्प को तू फिर से नयी विधा दे,
रुकती तरंगिणी को कल-कल निनाद कर दे,

प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ,
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ।

नदीम ज़हीर खान

मुझे ले चल मेरे प्रिय,




मुझे ले चल मेरे प्रिय,
तू अपने संसार में।
यह जग झूठा है,
नही रहना इसके प्यार में।।

मुझे ले चल मेरे प्रिय,


जहाँ कोइ मेरा नाम ना पूछे,
हो ऐसा मानव अभिसार।
जहाँ कोइ पहचान ना पूछे,
हो ऐसा सुन्दर संसार।।

मुझे ले चल मेरे प्रिय,


मुझे घुट-घुट के नही जीना है,
मुझे मर-मर के नही मरना है।
मै आज़ादी का पंक्षी हूँ,
आकाश को छोटा करना है।।

मुझे ले चल मेरे प्रिय,


छोड़ा है राजधरा को अपने,
किसी अल्हड़ राजकुँवर ने।
पहचान दिला दे तू इसको,
मदोन्मत्त बाहों की शरण मे।।

मुझे ले चल मेरे प्रिय,


तेरे सिवा मेरा कौन है,
इस घृणित संसार मे।
समझे ना मेेरी बात को पगली,
क्या रखा इस धिक्कार में।।

मुझे ले चल मेरे प्रिय ,,,

-नदीम जहीर खान