किस तरह झुठलाओगे मेरा मिजाज-ए-आशिकी,
मुश्क छुप सकता है पर छुपती नहीं आवारगी।
मेरे ग़मखाने से लेकर तेरे बुतखाने तलक,
ज़र्रे-ज़र्रे में सनम बिखरी हुई आवारगी।
तु इबादतगाह तक जा मैं चला मयखाने तक,
देखते हैं रंग किसकी लाती है आवारगी।
हसरतें जब नामुकम्मल हो के रह जाऐं नदीम,
इक क़दम आगे बढ़ाकर थाम लो आवारगी।
नदीम जहीर खान
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