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Friday, 11 July 2014

आग की भीख को समर्पित



धुँधली हुई दिशायें छाने लगा कुहासा,
हर ओर छा रहा है घनघोर यह धुआँ सा,

क्या आज हो रहा है कोई मुझे बता दे,
सोये हुए यौवन को कोई तो अब जगा दे,

दुखती हुई रगों में संचार माँगता हूँ,
उन्माद मांगता हूँ अंगार माँगता हूँ,

प्यारे स्वदेश हित का उद्धार माँगता हूँ,
चढ़ती जवानियों का श्रॄंगार माँगता हूँ।

पश्चिम से उठ रहा है निर्भीक सा अँधेरा,
पूरब की अरुणिमा को जाकर किसी ने घेरा,

मानवता के तिमिर में गंगा खटक रही है,
बेहाल और बेबस ममता तड़प रही है,

ललकार शत्रु की रुक-रुक के आ रही है,
पहचान को यह मेरे धूमिल बना रही है,

यौवन अनलविशिख की पहचान माँगता हूँ,
सोयी वसुन्धरा से तूफान माँगता हूँ ।

दाता मुझे दे शक्ति अह्वान कर दूँ इसका,
आकाश पर अनल से लिख दूँ मैं नाम इसका,

रुकती रगों को मेरे धारा अनलमयी दे,
हर दूँ प्राण एक जो तू प्राण मुझको कई दे,

पिघले हुए अनल का अमृत कहीं से ला दे,
दुखती रगों को मेरे फिर घोल यह पिला दे,

दौड़े स्वदेश हित जो चिंगार माँगता हूँ,
ऐसी जवानियों का अभिसार माँगता हूँ।

विनती मेरी है दाता सिंह्नाद सा स्वर दे,
सुल्तान का खड़ग दे सम्राट का ज्वर दे,

ठहरी हुई है कश्ती आवेग में बढ़ा दे,
प्रचंड धूर्त लहरों से फिर उसे लड़ा दे,

मुर्झाये पुष्प को तू फिर से नयी विधा दे,
रुकती तरंगिणी को कल-कल निनाद कर दे,

प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ,
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ।

नदीम ज़हीर खान

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